विदेश मुद्रा संरक्षण और विकास की निरंतरता  

पाठ्यक्रम: GS3/ अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • प्रधानमंत्री मोदी द्वारा आयातित वस्तुओं की खपत कम करने की अपील ने इस परिचर्चा को पुनः जीवित कर दिया है कि भारत को विदेशी मुद्रा बचाने के लिए खपत कम करनी चाहिए या दीर्घकालिक आर्थिक विकास बनाए रखने के लिए उत्पादन और उत्पादकता को सुदृढ़ करना चाहिए।

विदेशी मुद्रा भंडार क्या हैं?

  • विदेशी मुद्रा भंडार से आशय भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा रखी गई विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों से है।
  • इन भंडारों में मुख्यतः अमेरिकी डॉलर जैसी विदेशी मुद्राएँ, स्वर्ण भंडार, विशेष आहरण अधिकार (SDRs), और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) में आरक्षित स्थिति शामिल होती है।
  • महत्व: विदेशी मुद्रा भंडार आवश्यक हैं क्योंकि वे भारत को आयात वित्तपोषित करने, रुपये को स्थिर बनाए रखने, निवेशकों का विश्वास बनाए रखने और आर्थिक संकट के समय बाहरी भुगतान दायित्वों को पूरा करने में सहायता करते हैं।

भारत को सुदृढ़ विदेशी मुद्रा भंडार की आवश्यकता क्यों है?

  • आयात पर निर्भरता: भारत कच्चे तेल, उर्वरक, खाद्य तेल, सोना, इलेक्ट्रॉनिक्स और औद्योगिक मशीनरी के आयात पर अत्यधिक निर्भर है।
    • अतः भारत को निरंतर व्यापार और आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार की आवश्यकता होती है।
  • बाहरी आघातों से सुरक्षा: सुदृढ़ विदेशी मुद्रा भंडार वैश्विक वित्तीय अस्थिरता, बढ़ती तेल कीमतों, मुद्रा अस्थिरता और अचानक पूंजी बहिर्वाह के समय अर्थव्यवस्था की रक्षा करते हैं।
  • कमज़ोर विदेशी मुद्रा भंडार वाले देशों को प्रायः भुगतान संतुलन संकट और गंभीर मुद्रा अवमूल्यन का सामना करना पड़ता है।

भुगतान संतुलन (BoP)

  • भुगतान संतुलन किसी विशेष अवधि में भारत और विश्व के अन्य देशों के बीच सभी आर्थिक लेन-देन का अभिलेख है।
  • BoP के घटक:
    • चालू खाता : इसमें वस्तुओं और सेवाओं का व्यापार, प्रेषण एवं आय हस्तांतरण शामिल होते हैं। भारत सामान्यतः आयात अधिक करता है और निर्यात कम, जिसके परिणामस्वरूप चालू खाता घाटा (CAD) होता है।
    • पूंजी खाता : इसमें प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI), विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) और बाहरी उधारी शामिल होती है।
      • भारत ने परंपरागत रूप से अपने चालू खाता घाटे को विदेशी निवेशकों से पूंजी प्रवाह द्वारा वित्तपोषित किया है।

विदेशी मुद्रा भंडार और रुपये की विनिमय दर का संबंध

  • जब भारत में विदेशी मुद्रा का प्रवाह बहिर्वाह से अधिक होता है, तो भुगतान संतुलन अधिशेष में रहता है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार सुदृढ़ होते हैं और रुपया स्थिर रहता है।
  • लेकिन जब आयात तीव्रता से बढ़ते हैं या विदेशी निवेश प्रवाह कमज़ोर होता है, तो डॉलर का बहिर्वाह प्रवाह से अधिक हो जाता है।
    • ऐसी स्थिति में विदेशी मुद्रा भंडार घटते हैं और रुपया डॉलर के मुकाबले अवमूल्यित होता है।
    • कमज़ोर रुपया आयातित वस्तुओं जैसे कच्चे तेल और उर्वरकों की लागत एवं बढ़ा देता है, जिससे मुद्रास्फीति तथा बाहरी क्षेत्रीय दबाव और गंभीर हो जाते हैं।

खपत में कमी से संबंधित चिंताएँ

  • आर्थिक विकास पर प्रभाव: निजी खपत भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का सबसे बड़ा योगदानकर्ता है।
    • घरेलू व्यय में तीव्रता कमी समग्र आर्थिक मांग को कमज़ोर कर सकती है और आर्थिक विकास को धीमा कर सकती है।
  • स्वतंत्रता के बाद भारत ने आयात प्रतिस्थापन रणनीति अपनाई थी, जिसके परिणामस्वरूप औद्योगिक प्रतिस्पर्धा कमज़ोर रही, अक्षमता बढ़ी और आर्थिक विकास धीमा हुआ।
  • व्यवसाय निवेश पर प्रभाव: व्यवसाय तब निवेश करते हैं जब उपभोक्ता मांग सुदृढ़ रहती है। कमजोर मांग कंपनियों को उत्पादन विस्तार और नए निवेश से हतोत्साहित करती है।
  • रोज़गार पर प्रभाव: उत्पादन मांग कम होने से औद्योगिक विस्तार घट सकता है और रोज़गार सृजन प्रभावित हो सकता है।
  • विदेशी निवेश पर प्रभाव: विदेशी निवेशक उन अर्थव्यवस्थाओं को प्राथमिकता देते हैं जहाँ मांग मजबूत और विकास की संभावना अधिक होती है। खपत को जानबूझकर दबाने से भारत निवेश गंतव्य के रूप में कम आकर्षक हो सकता है।

आगे की राह

  • आत्मनिर्भरता और वैश्विक एकीकरण में संतुलन: भारत को अनावश्यक आयात कम करना चाहिए और साथ ही घरेलू विनिर्माण एवं निर्यात को सुदृढ़ करना चाहिए।
  • नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार धीरे-धीरे आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम कर सकता है।
  • औद्योगिक सुधार और तकनीकी प्रगति से उत्पादकता और निर्यात प्रतिस्पर्धा में सुधार होना चाहिए।
  • निवेश वातावरण को सुदृढ़ करना: भारत को दीर्घकालिक घरेलू और विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए व्यापार सुगमता में सुधार जारी रखना चाहिए।

Source: IE

 

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